मनुष्य को शांति पैसे से नहीं मिलती, त्याग में मिलती है। इसलिए मनुष्य को सिर्फ पैसे के पीछे नहीं भागना चाहिए । पैसा तो वक़्त के साथ आ ही जाता है । मनुष्य त्याग करके ही उस बहुमूल्य अनुभूति की प्राप्ति कर लेता है, जो उसे जीने के लिए पैसे से ज्यादा ताक़त देता है । और उस ताक़त से वह अपने जीवन को स्वर्णिम बनता है ।